आवारगी मे गुजारे जो लम्हे तमाम़,
अब इत्मीनान से बैठ के उन्हे त़हजीब लिखता हूँ।
चाँद सितारों सी चाहत जो मेरे लकीरों से थी रुख़सत़,
ता उम्र हो साथ तुम, तुम्हें रोज मै अपनी तकदीर लिखता हूँ।
तुम्हारे यादों के दिये जख्म़ों के मरहम़ हैं शायद,
पुराने बरगद़ तले तेरे जुल्फों की छाँव, फुरसत़ की ऐसी कई तस्वीर लिखता हूँ।