सोचता हूँ कोई गीत लिखूँ,
जिसमे तुम हो, तुम्हारी ही बात हो,
जिसमे तुम्हारा हँसना हो, रोना हो..
तुम्हारा रूठना मेरा मनाना हो,
जिसमें तुम्हारा सर मेरा कंधा हो,
मेरी आँखें हो और तुम्हारा सपना हो.....
जिसमे तुम हो, तुम्हारी ही बात हो,
जिसमे तुम्हारा हँसना हो, रोना हो..
तुम्हारा रूठना मेरा मनाना हो,
जिसमें तुम्हारा सर मेरा कंधा हो,
मेरी आँखें हो और तुम्हारा सपना हो.....
सोचता हूँ ऐसा कोई दिन लिखूँ,
जिसमे तुम्हारे साथ बिताए लम्हें तमाम हों,
भागती घडी के साथ बेचैन होता आलम हो,
जिसमे रस्तों पे नजरे टिकाए लम्हे इंतजार हो..
घाटों की सीढियों पे यूँ ही चुपचाप बैठना हो,
तुम्हारा नजरों से ही सबकुछ कहना हो,
मेरा नजरों से ही सबकुछ सुनना हो...
जिसमे तुम्हारे साथ बिताए लम्हें तमाम हों,
भागती घडी के साथ बेचैन होता आलम हो,
जिसमे रस्तों पे नजरे टिकाए लम्हे इंतजार हो..
घाटों की सीढियों पे यूँ ही चुपचाप बैठना हो,
तुम्हारा नजरों से ही सबकुछ कहना हो,
मेरा नजरों से ही सबकुछ सुनना हो...
सोचता हूँ ऐसी कोई रात लिखूँ,
जिसमे खुले आसमान तले,
सुर्ख लाल जोडों की रात हो,
और चाँद तारों की बारात हो..
जिसमे न दुनिया हो न दुनियादारी हो,
न मै हूँ और न तुम हो,
रात के आगोश मे पिघलता सिर्फ एक 'हम' हो..
जिसमे खुले आसमान तले,
सुर्ख लाल जोडों की रात हो,
और चाँद तारों की बारात हो..
जिसमे न दुनिया हो न दुनियादारी हो,
न मै हूँ और न तुम हो,
रात के आगोश मे पिघलता सिर्फ एक 'हम' हो..
सोचता हूँ फुर्सत का ऐसा कोई क्षण लिखूँ,
जिसमे गंगा का किनारा हो,
और दूर तक खाली रेत हो,
जिसमे तुम्हारा हाथ थामे,
घंटो तक चलना हो,
न कहीं जाना हो,न कहीं पहुचना हो....
जिसमे गंगा का किनारा हो,
और दूर तक खाली रेत हो,
जिसमे तुम्हारा हाथ थामे,
घंटो तक चलना हो,
न कहीं जाना हो,न कहीं पहुचना हो....
सोचता हूँ ऐसा कोई 'तुम' लिखूँ,
जो सिर्फ मेरी हो जो सिर्फ मुझमे हो,
सोचता हूँ ऐसा ही कोई मीत लिखूँ
ऐसा ही कोई गीत लिखूँ......
जो सिर्फ मेरी हो जो सिर्फ मुझमे हो,
सोचता हूँ ऐसा ही कोई मीत लिखूँ
ऐसा ही कोई गीत लिखूँ......