फाल्गुन मे कुछ बूंद छत से आ टपका है मन मे,
मन हिरण है ढूँढता तुम हो धरा पे या गगन मे।
दिवाकर के कुछ कण संघर्षरत है खुद की खुद मे,
व्याकुल हवा भी है भटक रही जैसे किसी की बिरह मे।
हो कहीं ठहराव कि तुम भी ठहरी हो जहाँ,
मै भी भटक कर ही सही शायद पहुँच जाऊँ वहां।
तुम्हारे कुछ लफ्ज़ जो बीज बन कर थे गिरे,
गीत बन कर हैं चल रहे, मेरे डगमग से सफर में।