मै महसूस करता हूं उस तारे के दर्द को
जिसका एक हिस्सा उससे अलग होकर
बिखरने जा रहा इस अनन्त ब्रह्माण्ड की गहराइयों में
जो शायद कभी लौट के वापस न आ पाए
आ भी जाएगा तो वैसे जुड़ नही पायेगा
मै सोचता हूँ कैसा महसूस होता होगा उन्हें
जो अरबों-खरबों साल एक साथ रहे
दो अलग-अलग अस्तित्वों में नहीं
वो रहे सदा एक इकाईं बन कर
वो इकाई जिनके सपने, मंजिलें और
जिनका ब्रह्माण्ड भी एक था,
मै सोचता हूँ उस टूटे हिस्से के भी बारे में
जो अभी-अभी टूटा है एक अपने तारे से
जो तयं करने जा रहा एक नया सफर
जिसको मिलनी है एक नई मंजिल
क्या वो रोमांचित होगा नए मंजिल को लेकर
या अभी भी उसको दुःख होगा
बिछड़ने का अपने तारे से
मै इस टूटे तारे को देख कर सोच रहा
क्या ये अपने मंजिल पर पहुंच कर खुश हो पाएगा
क्या उससे भी वैसे जुड़ पाएगा
जैसे जुड़ा था वो अपने पुराने तारे से
क्या इंसान भी किसी नए के मिल जाने से
उससे अलग हो पाते होंगे
जिससे जुड़े थे कभी एकांकी बन कर।
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