Friday, 11 July 2014

आजाद रोशनाई (शायरी)

आवारगी मे गुजारे जो लम्हे तमाम़,
अब इत्मीनान से बैठ के उन्हे त़हजीब लिखता हूँ।

चाँद सितारों सी चाहत जो मेरे लकीरों से थी रुख़सत़,
ता उम्र हो साथ तुम, तुम्हें रोज मै अपनी तकदीर लिखता हूँ।

तुम्हारे यादों के दिये जख्म़ों के मरहम़ हैं शायद,
पुराने बरगद़ तले तेरे जुल्फों की छाँव, फुरसत़ की ऐसी कई तस्वीर लिखता हूँ।

Saturday, 5 July 2014

SLS in the rain

पहले बारिश मे भीगना अच्छा लगता है..
अकेले भीगते हुए खामोशियों मे तुम्हारे बारे मे सोचते हुए खुद से ही बातें करते हुए कभी कभी यूँ ही बेवजह हँस देना फिर हसते हुए खुद ही आखों मे आंसू आ जाते है।सच तो है जब तुम नही होती तो ये तन्हाइयाँ ही सबसे अच्छी दोस्त होती हैं,और ..................दुश्मन भी।

Thursday, 26 June 2014

आखिरी पल

जब से सुना है कि तुम यहाँ आई हो किसी भी काम मे मन नही लग रहा है मन अजीब सा बिचलित हो उठा है। घूमने के लिए निकला तो इधर चला आया, यहाँ बैठा हूँ तो यादें भी तुम्हारे ही बारे मे पूछ रही हैं।जिन बातों को लेकर मै अक्सर इस स्थान कि शिकायत किया करता था वो सब कुछ ठीक हो चुका है बस तुम नही हो।देखो ना मै आज यहाँ अपने मन से आया हूँ, प्लीज आ जाओ न यार देखो कितना अच्छा हो गया है यहाँ।सचमुच ये जगह कितनी प्यारी है, टूटा चेयर भी ठीक हो गया है फूल पौधे भी लग गये हैं।कितना साफ सफाई हो गया है।अपने यहाँ का नगर निगम इतना काम करने वाला कब से हो गया इन दो सालों में कितना कुछ बदल गया है नही तो यहां कितना बुरा हाल रहता था।फिर भी तुमको ये जगह कितनी पसन्द थी।पिछली बार तुम्हारे साथ ही यहाँ आया था उसके बाद इधर कभी आने का मन ही नही किया।इन दो सालों मे तुम्हारी यादों से भागने कि कितनी कोशिश की मैने और शायद तुमको भुला भी दिया था मगर आज तुम्हारे आने की खबर सुनकर बाइक जैसे अपने आप ही इधर भागी चली आई। लग रहा है अभी बस कुछ दिनो कि बात है जब तुम जबरदस्ती यहाँ आने के लिए बुलाये जा रही थी तुमको आखिरी बार जो मिलना था और मै भी इस बात से अंजान भागा चला आया।
   यार तुमको ये जगह ही क्यों पसंद आती है ? कितना गंदा है यहाँ लगता है कभी साफ सफाई ही नही होती और एक भी चेयर ठीक ठाक नही है कोई भी यहाँ नही बैठना चाहता।साॅरी तब चलिए कहीं और चलते हैं बस यहाँ कोई हमे डिस्टर्ब न करे इसीलिए आती हूँ नही तो हर जगह लोग अजीब अजीब नजरों से देखते हैं। क्या हुआ यार? तुम तो ऐसे कभी बात नही करती थी, पहले कभी यहाँ की बुराई करने पे तो लडने लग जाती थी।'मुझे कुछ जरूरी बात करनी है और मै नही चाहती कोई डिस्ट्रबेंस हो' बोलते बोलते तुम्हारे आखों मे आंसू क्यों आ गये थे मुझे उस समय तो बिल्कुल ही समझ नही आया पर तुमको रोता देख मेरी तो धडकन ही बढ गयी थी यार क्या हो जाता है तुमको मै तो बस ऐसे ही बोल दिया था, इसमे तुम्हारी क्या गलती ये तो नगर निगम वालों का काम है।पूरा घंटा भर से ज्यादा लगा गया था तुमको नार्मल होने मे।कितने पुराने कुछ नये कुछ अपने से बना के पता नही कितने चुटकुले कहानियाँ तुमको सुनाया मगर मजाल है तुमको हँसी आई हो।इतना ट्राई ना करो मै नार्मल हूँ, मै किसी और बात पे रो रही थी मुझे तुम्हारे चुटकुलों से ज्यादा तुम्हारे चेहरे पे हंसी आ रही है देखो तो कैसे चेहरे पे से हवाइहाँ ही गुम है।तुमको हसते देख कितना सुकून मिला था पर तुम्हारे मजाक उडाने से गुस्सा भी बहुत आया था मगर फिर तुमको हसता हुआ देख एक मिनट मे गुस्सा काफूर हो गया पर तुम्हारी इस झूठी हसी को मै एक पल के लिए सही मान बैठा था। पर अगले ही पल तुमने जो कुछ भी कहा वो मेरा होस उडाने के लिए काफी था।
      तुम थोडा सा आसूं देख इतना परेशान क्यों हो जाते हो, इतना भी प्यार ना किया करो नही तो आगे चल के मेरे लिए भी बहुत दिक्कत हो जायेगी और तुमको भी अपने आप को अकेले संभालना बहुत मुश्किल हो जायेगा।ऐसा क्यों कह रही हो कि अकेले अपने आप को संभालना मुश्किल हो जाएगा तुम हो ना मुझे संभालने के लिए।मै हमेशा तुम्हारे साथ थोडे ना रहूँगी मेरी शादी हो जायेगी तो मै जाउँगी नही क्या।कहां जाओगी मै तुम्हे कहीं नही जाने दूँगा। देखो मै सीरियसली बोल रही हूँ मुझे परसों ही देखने आये थे और शायद पसन्द भी आ गई हूँ, अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो दो तीन महीने मे शादी भी हो जायेगी तो हमे अभी से धीरे धीरे बात चीत करना कम करना होगा।
     उस समय सारे शहर मे जैसे अन्धेरा छा गया हो। रास्ते एकदम सुनसान से लगने थे जैसे लग रहा था किसी ने बस्ती को तहस नहस कर दिया हो और सबका इल्जाम मेरे सर आ गया हो।फिर भी मैने अपने आप को थोडा संभालते हुए बोला "मै तुम्हारे पापा से अभी चल के बात करता हूँ उन्हे बताते है कि हम दोनो एक दूसरे से प्यार करते हैं और शादी भी करना चाहते हैं।" देखो मै जानती हूँ पापा को वो नही मानेंगे और ऊपर से बवाल होगा सो अलग।सो प्लीज बात समझने की कोशिश करो हम दोनो का साथ यहीं तक था मै तुम्हारी अच्छी अच्छी यादें ले के जाना चाहती हूँ, इतना बोलते बोलते तुम कितना फूट फूट के रोने लगी थी और शायद मै भी तो रो ही रहा था मगर गुस्सा भी बहुत आ रहा था।तो धीरे धीरे क्यों अभी से बात चीत करना बंद करते हैं।
     तुमको मैने वहां अकेले रोते हुए छोड के आ गया था शायद गुस्से मे होने के कारण मगर ऐसा भी क्या गुस्सा वो भी तुमसे जिसकी एक आसूं देख कर मेरी सासें रुक जाती थी।बाद मे तुमको कितना काल किया मैसेज भी किया कि एक बार बात कर लो कितनी कस्मे दिलाई मगर तुमने कभी जवाब नही दिया।तुम्हारी छोटी बहन बाद मे बताई थी कि तुमने उस दिन घर आ कर अपने मम्मी से मेरे बारें मे बताया था तो उन्होंने तुम्हारे गाल पे एक जोरदार थप्पड रसीद दिया था और फिर छाती पीट पीट के पूरा घर सर पे उठा लिया था।तुम्हारे बारे मे भी बता रही थी कि तुम्हारा भी रो रो कर बुरा हाल हो गया था तमने खाना पीना भी छोड दिया था फिर धीरे धीरे हालात से समझौता कर लिया।
     यहाँ बैठे बैठे काफी रात हो गई यार मेरे आँखो से आसूं क्यों निकल रहे अब तो कितना दिन हो चुका फिर क्यों तुम्हारी इतनी याद आ रही।तुम्हारे घर की तरफ से चलूँ क्या आखिर रास्ते मे ही तो है मगर इसकी क्या गारंटी तुम दिख ही जाओगी इतनी रात हो चुकी है।अगर दिख गई तो मै अपने आप को संभालुँगा कैसे पता नही अब तुमको देख कर क्या करना मगर एक बार देखना चाह रहा हूं प्लीज सामने आ जाना।

Monday, 23 June 2014

SLS the time of writing

तुमने मेरा काल क्यों नही रिसीव किया ?

बस ऐसे ही कुछ लिख रहा था।

तुमने तो बताया था कि तुम मेरे और तुम्हारे बारे मे ही कु लिखने वाले हो,

हाँ वही लिख रहा था।

तो क्या तुमको मुझसे बात करने से ज्यादा मेरे बारे मे लिखना अच्छा लगता है?

जब मै लिखता हूँ लगता है तुम लफ्जों मे ढल कर मेरे पास बैठी रहती हो, ये सेल फोन पर बातें करना मुझे तुमसे दूरी का एहसास कराता है।

Sunday, 22 June 2014

बरसात की पहली रात

रात को अचानक जब बारिस स्टार्ट हुई तो हम सारे लोग दौड के छत की तरफ भागने लगे कितना रोमांचित करती है ये बारिस इंसान का सारा रुमानियत और सारा रोमांस एक पल मे बाहर आ जाता है और खासकर यदि ये सावन की पहली बरसात हो।सारे लोग बस भीग जाना चाहते थे और इतना हो हल्ला कि  कुछ पडोसी तो पक्का हम लोगों को गालियाँ देने मे लगे होगे और दे भी क्यों न आखिर रात को एक बज रहे थे।
    दरअसल हम लोग जिस प्राइवेट हास्टल मे रहते हैं वो एक रिहायशी इलाके मे है तो पडोसी वैसे भी परेशान रहते है हास्टल के शोर शराबा से ये उनका रोज का प्राब्लम है इसलिए हम लोग उनके बारे मे सोचना ही बन्द कर दिए हैं मगर इतना धूप और गर्मी के कारण ऊपर के जिस इकलौते रूम मे लोग रात मे भी बैठना तक पसंद नही करते थे अब उस रूम मे सोने के लिए झगडे होने लगे फिर सब एक दूसरे के ऊपर तर-बतर लेटे गये और हवा भी इतनी ठण्डी की दिन मे पैंतालिस डिग्री का तापमान और उमस झेलने के बाद जो राहत मिली उससे सबको लेटते ही नीद आने लगी और कुछ कुछ मुझे भी,
        मगर मुझे लेटे लेटे और सबको सोता देख वो साइकिल रिक्शा वाला याद आने लगा जिसको कल रात सडक के किनारे कुछ बच्चे परेशान कर रहे थे मगर शराब के नशे मे होने के कारण वो कोई प्रतिक्रिया नही दे रहा था जैसे कि वो कोई बहुत गहरी नींद मे सोया हो और किसी के परेशान करने का उसपर कोई फर्क नही पडने वाला यद्यपि कि उसका ढंग बता रहा था कि वो सोया नही है और जग रहा था।मगर लोग बच्चों को डाटने के बजाय रिक्शे वाले को शराबी बोल के हसते हुए निकल जा रहे थे और बच्चे भी बगल के मलिन बस्ती के थे और ये उनका रोज का आदत था और हमारे हास्टल के रास्ते मे होने के कारण हमे रोज मार्केट से लौटते वक्त ये खेल देखने का अवसर मिलता था और हम भी उसी शराबी को दोष देते निकल जाया करते थे, मगर आज पहलीबार उसके बारे में इतनी गहराई से सोच रहा हूँ कौन है वो आदमी ? वो क्यों दिनभर मेहनत करके कमाने के बाद रात मे उन पैसों का कुछ भाग शराब पीकर उडा देता है ? क्या वो यह इसलिए पीता है ताकि रात को सुकून से सो सके ? मगर वो इतनी रात को बरसात मे गया कहाँ होगा ?
    बस अब मुझसे रहा नही गया मैने अपना रेनकोट पहना और उसको देखने निकल गया मगर वो अपने स्थान पे नही मिला जो कि आपेक्षित था फिर काफी ढूढने के बाद एक ढाबे पे कुछ लोग सोये दिखे जहाँ थोडा सा छत था रात होने के कारण बंद भी और जिन महाशय के लिए मै रात को ढाई बजे बरसात मे घूम रहा हूँ वो यहाँ पे मस्त नीद सोये हुए हैं।मै अन्दर से इतना शरारती हूँ कि अगर मुझे नींद न आए तो मै किसी और को सोने नही देता और इनके बारे मे सोचते हुए इनसे भी एक आत्मीय संबंध तो बन ही चुका है, मगर पता नही क्यों इस आदमी को सोता देख इतना अच्छा लग रहा है शायद अपने बच्चे को सोता देख किसी माँ को इतनी ही खुशी होती होगी।मै फिर सोचने लगा कि बस्ती के सारे मां बाप बच्चों को मना क्यों नही करते ? आखिर वो भी तो इतने ही गरीब हैं या इससे थोडी सी बेहतर स्थिति मे हैं, उनका अपना यहाँ घर है मगर वो तो अबैध ही है नगर निगम हर महीने गिरा के जाती है और वो फिर से खडा कर लेते हैं तो क्या अपने बच्चों को नही समझा सकते कि किसी को इतना परेशान नही किया जाता या कहीं यह इसलिए प्रतिक्रिया नही करता क्योंकि कि वो बच्चे इसे इसके घर का याद दिलाते होगे क्योंकि जिस उमर मे लोग अपने पोते पोतियों से खेलते हैं उस उमर मे ये अपने घर से सैकडो किलोमीटर दूर रिक्शा चला रहा है खुछ भी हो मैने अपने आप को झूठी सान्त्वना देते हुए और अपने नीद से हारे हुए कि नही यह आराम से सोया हुआ है अपने हास्टल की तरफ बढ आया अब मेरी आँखे अपने आप बंद होने की कोशिश कर रही हैं और बरसात भी बन्द हो चुकी है मगर ठण्डा हवा बहना अब भी जारी है।।

Tuesday, 17 June 2014

मेरी दादी

आज दादी की केवल पिक्चर डाल  रहा हूँ कभी इनके बारे में बिस्तार से लिखूंगा

आप का संदीप पाण्डेय