Sunday, 22 June 2014

बरसात की पहली रात

रात को अचानक जब बारिस स्टार्ट हुई तो हम सारे लोग दौड के छत की तरफ भागने लगे कितना रोमांचित करती है ये बारिस इंसान का सारा रुमानियत और सारा रोमांस एक पल मे बाहर आ जाता है और खासकर यदि ये सावन की पहली बरसात हो।सारे लोग बस भीग जाना चाहते थे और इतना हो हल्ला कि  कुछ पडोसी तो पक्का हम लोगों को गालियाँ देने मे लगे होगे और दे भी क्यों न आखिर रात को एक बज रहे थे।
    दरअसल हम लोग जिस प्राइवेट हास्टल मे रहते हैं वो एक रिहायशी इलाके मे है तो पडोसी वैसे भी परेशान रहते है हास्टल के शोर शराबा से ये उनका रोज का प्राब्लम है इसलिए हम लोग उनके बारे मे सोचना ही बन्द कर दिए हैं मगर इतना धूप और गर्मी के कारण ऊपर के जिस इकलौते रूम मे लोग रात मे भी बैठना तक पसंद नही करते थे अब उस रूम मे सोने के लिए झगडे होने लगे फिर सब एक दूसरे के ऊपर तर-बतर लेटे गये और हवा भी इतनी ठण्डी की दिन मे पैंतालिस डिग्री का तापमान और उमस झेलने के बाद जो राहत मिली उससे सबको लेटते ही नीद आने लगी और कुछ कुछ मुझे भी,
        मगर मुझे लेटे लेटे और सबको सोता देख वो साइकिल रिक्शा वाला याद आने लगा जिसको कल रात सडक के किनारे कुछ बच्चे परेशान कर रहे थे मगर शराब के नशे मे होने के कारण वो कोई प्रतिक्रिया नही दे रहा था जैसे कि वो कोई बहुत गहरी नींद मे सोया हो और किसी के परेशान करने का उसपर कोई फर्क नही पडने वाला यद्यपि कि उसका ढंग बता रहा था कि वो सोया नही है और जग रहा था।मगर लोग बच्चों को डाटने के बजाय रिक्शे वाले को शराबी बोल के हसते हुए निकल जा रहे थे और बच्चे भी बगल के मलिन बस्ती के थे और ये उनका रोज का आदत था और हमारे हास्टल के रास्ते मे होने के कारण हमे रोज मार्केट से लौटते वक्त ये खेल देखने का अवसर मिलता था और हम भी उसी शराबी को दोष देते निकल जाया करते थे, मगर आज पहलीबार उसके बारे में इतनी गहराई से सोच रहा हूँ कौन है वो आदमी ? वो क्यों दिनभर मेहनत करके कमाने के बाद रात मे उन पैसों का कुछ भाग शराब पीकर उडा देता है ? क्या वो यह इसलिए पीता है ताकि रात को सुकून से सो सके ? मगर वो इतनी रात को बरसात मे गया कहाँ होगा ?
    बस अब मुझसे रहा नही गया मैने अपना रेनकोट पहना और उसको देखने निकल गया मगर वो अपने स्थान पे नही मिला जो कि आपेक्षित था फिर काफी ढूढने के बाद एक ढाबे पे कुछ लोग सोये दिखे जहाँ थोडा सा छत था रात होने के कारण बंद भी और जिन महाशय के लिए मै रात को ढाई बजे बरसात मे घूम रहा हूँ वो यहाँ पे मस्त नीद सोये हुए हैं।मै अन्दर से इतना शरारती हूँ कि अगर मुझे नींद न आए तो मै किसी और को सोने नही देता और इनके बारे मे सोचते हुए इनसे भी एक आत्मीय संबंध तो बन ही चुका है, मगर पता नही क्यों इस आदमी को सोता देख इतना अच्छा लग रहा है शायद अपने बच्चे को सोता देख किसी माँ को इतनी ही खुशी होती होगी।मै फिर सोचने लगा कि बस्ती के सारे मां बाप बच्चों को मना क्यों नही करते ? आखिर वो भी तो इतने ही गरीब हैं या इससे थोडी सी बेहतर स्थिति मे हैं, उनका अपना यहाँ घर है मगर वो तो अबैध ही है नगर निगम हर महीने गिरा के जाती है और वो फिर से खडा कर लेते हैं तो क्या अपने बच्चों को नही समझा सकते कि किसी को इतना परेशान नही किया जाता या कहीं यह इसलिए प्रतिक्रिया नही करता क्योंकि कि वो बच्चे इसे इसके घर का याद दिलाते होगे क्योंकि जिस उमर मे लोग अपने पोते पोतियों से खेलते हैं उस उमर मे ये अपने घर से सैकडो किलोमीटर दूर रिक्शा चला रहा है खुछ भी हो मैने अपने आप को झूठी सान्त्वना देते हुए और अपने नीद से हारे हुए कि नही यह आराम से सोया हुआ है अपने हास्टल की तरफ बढ आया अब मेरी आँखे अपने आप बंद होने की कोशिश कर रही हैं और बरसात भी बन्द हो चुकी है मगर ठण्डा हवा बहना अब भी जारी है।।

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